केरल का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम संशोधन विधेयक:

केरल का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम संशोधन विधेयक: मानव-वन्यजीव संघर्ष के समाधान की पहल

केरल मंत्रिमंडल ने हाल ही में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA), 1972 में बदलाव के लिए एक संशोधन विधेयक को मंजूरी दी है। इस विधेयक का उद्देश्य बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को ध्यान में रखते हुए, उन वन्यजीवों को नियंत्रित करना है जो मानव जीवन के लिए प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न करते हैं। यह पहली बार है जब किसी राज्य ने केंद्रीय कानून में इस तरह का संशोधन प्रस्तावित किया है।


📝 विधेयक के मुख्य बिंदु

  • मुख्य वन्यजीव वार्डन (CWW) को यह अधिकार मिलेगा कि वह ऐसे किसी भी वन्यजीव को मारने का आदेश दे सके, जो मानव आबादी वाले क्षेत्रों में हमला करता है।

  • वर्तमान में, WPA केवल तभी शिकार की अनुमति देता है जब CWW यह प्रमाणित करे कि अनुसूची I, II, III या IV के किसी वन्यजीव से मानव जीवन को खतरा है।

  • प्रस्तावित संशोधन राज्य सरकार को यह अधिकार देगा कि वह अनुसूची II में शामिल किसी भी वन्यजीव को “वर्मिन (पीड़क)” घोषित कर सके।

  • वर्तमान में, धारा 62 यह अधिकार केवल केंद्र सरकार को देती है कि वह अनुसूची I और II (भाग II) को छोड़कर अन्य प्रजातियों को वर्मिन घोषित कर सके।

  • किसी प्रजाति को वर्मिन घोषित करने पर निर्धारित क्षेत्र और अवधि में उसका वध कानूनी रूप से संभव हो जाता है।


⚠️ मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने के कारण

  1. पर्यावास की हानि

    • वनों की कटाई, शहरीकरण और अतिक्रमण से वन्यजीव गलियारे नष्ट हो रहे हैं।

  2. संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा

    • भोजन और पानी की कमी से जानवर गांवों और खेतों की ओर रुख कर रहे हैं।

  3. जलवायु परिवर्तन

    • चरम मौसमी घटनाओं से प्रवास पैटर्न बदल रहा है, जिससे जानवर मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं।

  4. अवैध शिकार एवं व्यापार

    • जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचने से वन्यजीव विस्थापित होते हैं और संघर्ष की स्थिति बनती है।


📌 निष्कर्ष

केरल का यह कदम मानव जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, लेकिन इससे वन्यजीव संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, इस तरह के प्रावधानों को लागू करते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है ताकि संरक्षण और मानव सुरक्षा दोनों सुनिश्चित किए जा सकें।