- हींग (फेरुला अस्सा-फोएटिडा) (Hing (Ferula assa-foetida))
- हाल ही में पालमपुर, हिमाचल प्रदेश में, सीएसआईआर (वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद) ने हींग (फेरुला अस्सा-फोएटिडा) के पहले पुष्पन और बीज उत्पादन की सफल रिपोर्ट दी है।
हींग के बारे में (About Hing)
- हींग एक बारहमासी पौधा है, जिसे परिपक्व होने और फूल आने में लगभग 5 वर्ष लगते हैं।
- यह मूल रूप से ईरान, अफगानिस्तान, और मध्य एशिया के ठंडे और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में पनपता है।
हींग के लिए अनुकूल जलवायु (Favourable Climate for Hing)
- मिट्टी: रेतीली, अच्छी जल निकासी वाली, कम नमी वाली मिट्टी।
- वर्षा: आदर्श वार्षिक वर्षा 200 मिमी से कम, पर हिमालयी क्षेत्रों में 300 मिमी तक सहन कर सकता है।
- पनपने के लिए: 10−20∘C
- अधिकतम सहनशीलता: 40∘C
- न्यूनतम सहनशीलता: −4∘C
- सर्दियों में और अत्यंत शुष्क परिस्थितियों में पौधे निष्क्रिय हो जाते हैं।
हींग का निष्कर्षण (Extraction of Hing)
- अंतिम उत्पाद, हींग, पौधे की मूल जड़ और प्रकंद से प्राप्त ओलियो-गम रेजिन से निकलता है।
- प्रक्रिया:
- जड़ में चीरे लगाए जाते हैं।
- दूधिया लेटेक्स निकलता है, जो गोंद जैसी कठोर राल में बदल जाता है।
- इस राल को सूखाकर पाउडर या क्रिस्टल में संसाधित किया जाता है।
- यह राल 40-64% तक शुद्ध सूखे गोंद के रूप में प्राप्त होती है।
- इसका उपयोग पाक कला और औषधीय प्रयोजनों के लिए होता है।
भारत में हींग की खेती (Cultivation of Hing in India)
- भारत में फेरुला अस्सा-फोएटिडा की खेती पहले नहीं होती थी; देश ईरान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान आदि से आयात पर निर्भर था।
- फेरुला की लगभग 130 प्रजातियाँ विश्व में पाई जाती हैं, परंतु केवल फेरुला अस्सा-फोएटिडा आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हींग-उत्पादक प्रजाति है।
- भारत में:
- फेरुला अस्सा-फोएटिडा स्वतः नहीं पाई जाती।
- हिमाचल के चंबा क्षेत्र में फेरुला जेस्केना तथा कश्मीर व लद्दाख में फेरुला नार्थेक्स पाई जाती है पर ये हींग उत्पादक प्रजातियाँ नहीं हैं।