सुर्ख़ियों में रहे व्यक्तित्व : श्री नारायण गुरु
हाल ही में श्री नारायण गुरु (1856-1928) की जयंती मनाई गई। वे केवल एक संत ही नहीं, बल्कि एक महान सामाजिक सुधारक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे, जिन्होंने 19वीं-20वीं शताब्दी के समाज में समानता और न्याय की नींव रखी।
प्रमुख योगदान
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एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर
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उन्होंने समाज को विभाजित करने वाली जातिगत रुकावटों को तोड़ते हुए समानता और भाईचारे का संदेश दिया।
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एझावा समुदाय का उत्थान
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उन्होंने शिक्षा और संगठन के लिए श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (SNDP) की स्थापना की।
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अरुविपुरम आंदोलन
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यह आंदोलन सभी जातियों के लिए मंदिर प्रवेश अधिकार सुनिश्चित करने की शुरुआती पहलों में से एक था।
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वायकोम सत्याग्रह (1924-25) का समर्थन
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त्रावणकोर में मंदिर प्रवेश आंदोलन को समर्थन देकर उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता की लड़ाई को मजबूत किया।
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आश्रम की स्थापना
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उन्होंने “ॐ सहोदरयम सर्वत्र” (सभी मनुष्य ईश्वर की नजर में समान हैं) के सिद्धांत पर आधारित आश्रम की स्थापना की।
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उनके विचारों और जीवन से मिलने वाले मूल्य
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समानता – सभी मनुष्यों के लिए समान अधिकार
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अहिंसा और करुणा – शांतिपूर्ण और संवेदनशील जीवन का मार्ग
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सत्यनिष्ठा – नैतिकता और ईमानदारी पर आधारित आचरण
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साहस – सामाजिक बंधनों को तोड़ने का संकल्प
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शिक्षा का महत्व – शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का आधार माना
निष्कर्ष
श्री नारायण गुरु ने अपने विचारों और कार्यों से यह साबित किया कि सामाजिक परिवर्तन का आधार आध्यात्मिकता और समानता हो सकता है। उनके संदेश आज भी भारत को एक न्यायपूर्ण, समान और करुणामय समाज की ओर ले जाने में मार्गदर्शक हैं।