वन संसाधन एवं वनोन्मूलन (Forest Resources and Deforestation) – चैप्टर-वार नोट्स
पर्यावरण एवं सामाजिक अध्ययन • सहायक अध्यापक (प्राथमिक स्तर, कक्षा 1–5) • उ.प्र. शिक्षा सेवा चयन आयोग
वनों का महत्व, भारत में वन आवरण, वनों के प्रकार, वनोन्मूलन के कारण व प्रभाव, वन आंदोलन, वन कानून व नीतियाँ – सब एक जगह।
विषय-सूची
| क्र. | अनुभाग |
|---|---|
| 1 | वन : अर्थ एवं परिचय |
| 2 | वनों का महत्व |
| 3 | भारत में वन आवरण |
| 4 | भारत के वनों के प्रकार |
| 5 | प्रशासनिक आधार पर वनों का वर्गीकरण |
| 6 | वनोन्मूलन : अर्थ एवं कारण |
| 7 | वनोन्मूलन के प्रभाव |
| 8 | वन संरक्षण के जन आंदोलन |
| 9 | वन संरक्षण के कानून, नीतियाँ एवं कार्यक्रम |
| 10 | वन संरक्षण के उपाय एवं शिक्षक की भूमिका |
| 11 | परीक्षा उपयोगी तथ्य एवं अभ्यास प्रश्न |
वन : अर्थ एवं परिचय
वन (Forest) वह बड़ा प्राकृतिक क्षेत्र है जहाँ पेड़,
झाड़ियाँ, घास, लताएँ और उनके साथ पशु-पक्षी, कीट और
सूक्ष्मजीव मिलकर एक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem)
बनाते हैं। वन केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं — ये मिट्टी, जल, वायु और जीवों के बीच संतुलन
बनाए रखने वाली एक जीवित व्यवस्था हैं।
वन एक नवीकरणीय (Renewable) प्राकृतिक संसाधन है — यानी
कटने के बाद इसे दोबारा उगाया जा सकता है। परंतु यदि कटाई की गति, नए पेड़ उगने की
गति से अधिक हो जाए, तो यह संसाधन समाप्त होने लगता है। इसी
स्थिति को वनोन्मूलन (Deforestation) कहते हैं।
भारत में वनों से जुड़ी सबसे प्रमुख संस्था भारतीय वन सर्वेक्षण (Forest
Survey of India — FSI) है, जिसका मुख्यालय देहरादून
(उत्तराखंड) में है। यह हर दो वर्ष में “भारत वन
स्थिति रिपोर्ट” (India State of Forest Report — ISFR) जारी करती
है। भारतीय वानिकी अनुसंधान से जुड़ा वन अनुसंधान संस्थान (FRI) भी
देहरादून में ही है।
हैं — जैसे घर हमें छत, भोजन और सुरक्षा देता है, वैसे ही वन पशु-पक्षियों को घर
और हम सबको हवा, पानी, भोजन और लकड़ी देते हैं।”
वनों का महत्व
वनों का महत्व तीन स्तरों पर समझा जा सकता है — पर्यावरणीय
(पारिस्थितिक), आर्थिक और
सामाजिक-सांस्कृतिक। आइए इन्हें एक-एक करके समझें।
◆ (क) पर्यावरणीय महत्व
ऑक्सीजन और कार्बन संतुलन — पेड़ प्रकाश
संश्लेषण से वायु की कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर ऑक्सीजन
छोड़ते हैं। इसलिए वनों को “पृथ्वी के फेफड़े” और “कार्बन
सिंक” कहा जाता है। इससे जलवायु परिवर्तन को कम करने में
सहायता मिलती है।
वर्षा और जल चक्र — पेड़ वाष्पोत्सर्जन
(Transpiration) द्वारा वायु में नमी छोड़ते हैं, जिससे बादल बनने और
वर्षा में सहायता मिलती है। वनों वाले क्षेत्रों में वर्षा अपेक्षाकृत
अधिक और नियमित होती है।
मृदा संरक्षण — पेड़ों की जड़ें मिट्टी को
बाँधकर रखती हैं, जिससे वर्षा और हवा से मृदा अपरदन नहीं
होता। पत्तियों के सड़ने से ह्यूमस बनता है, जो मिट्टी को उपजाऊ
बनाता है।
बाढ़ नियंत्रण और भूजल पुनर्भरण — वन वर्षा के पानी की गति
धीमी करते हैं; पानी धीरे-धीरे ज़मीन में रिसता है, जिससे भूजल स्तर
बढ़ता है और अचानक बाढ़ नहीं आती।
जैव विविधता का घर — भारत के अधिकांश पौधे और जीव-जंतु वनों में
ही रहते हैं। वन नष्ट होने पर अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती
हैं।
तापमान नियंत्रण — वन क्षेत्र आसपास के तापमान को
ठंडा रखते हैं और लू व
मरुस्थलीकरण को रोकते हैं।
◆ (ख) आर्थिक महत्व
वनों से हमें मुख्य उत्पाद — इमारती लकड़ी
(सागौन, साल, देवदार, शीशम) और ईंधन लकड़ी — मिलते हैं।
गौण वन उत्पाद (Minor Forest Produce) भी बहुत महत्वपूर्ण हैं
— तेंदू पत्ता (बीड़ी), बाँस (जिसे “गरीबों की
लकड़ी” कहते हैं), लाख, गोंद, कत्था, शहद, महुआ, चिरौंजी, आँवला, जड़ी-बूटियाँ,
रेज़िन (चीड़ से), बेंत।
वन कागज़, फ़र्नीचर, दियासलाई, प्लाईवुड, खेल सामान, औषधि जैसे
उद्योगों को कच्चा माल देते हैं।
इको-पर्यटन — राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और हिल स्टेशन पर्यटन
से रोज़गार देते हैं।
◆ (ग) सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
भारत के करोड़ों आदिवासी और वनवासी लोगों का भोजन,
आवास, औषधि और आजीविका सीधे वनों पर निर्भर है।
भारतीय संस्कृति में पीपल, बरगद, तुलसी, नीम, खेजड़ी जैसे पेड़ों की
पूजा होती है। कई गाँवों में “पवित्र उपवन” (Sacred Groves) होते
हैं — जैसे महाराष्ट्र में देवराई, राजस्थान में
ओरण, मेघालय में लॉ किन्तांग — जहाँ पेड़ काटना
वर्जित होता है। यह परंपरा वन संरक्षण का सुंदर उदाहरण है।
भारत में वन आवरण
भारत में वनों की स्थिति जानने के लिए भारत वन स्थिति रिपोर्ट
(ISFR) देखी जाती है। नवीनतम ISFR 2023 (दिसम्बर
2024 में जारी) के अनुसार भारत का वन आवरण लगभग 21.76% और
वृक्ष आवरण लगभग 3.41% है — अर्थात कुल वन एवं वृक्ष आवरण
लगभग 25.17% (लगभग 8.27 लाख वर्ग किमी)।
वन आवरण (Forest Cover) और वृक्ष आवरण (Tree
Cover) में अंतर समझना ज़रूरी है — वन आवरण वह भूमि है
जो 1 हेक्टेयर या अधिक हो और जिसमें 10% से अधिक
वृक्ष-छत्र (Canopy) हो, चाहे उसका स्वामित्व किसी का भी हो।
वृक्ष आवरण वन क्षेत्र के बाहर बिखरे पेड़ों (खेतों की मेड़ों, सड़कों,
गाँवों में) को कहते हैं।
राष्ट्रीय वन नीति 1988 का लक्ष्य है कि देश के 33%
भू-भाग पर वन हों, और पहाड़ी क्षेत्रों में 66%
(दो-तिहाई)। भारत अभी इस लक्ष्य से पीछे है।
| प्रश्न | उत्तर (ISFR 2023 के अनुसार) |
|---|---|
| क्षेत्रफल में सबसे अधिक वन आवरण वाला राज्य | मध्य प्रदेश → दूसरा अरुणाचल प्रदेश → तीसरा छत्तीसगढ़ |
| प्रतिशत में सबसे अधिक वन आवरण (राज्य) | मिज़ोरम; केंद्रशासित प्रदेशों में लक्षद्वीप |
| सबसे कम वन आवरण वाले राज्य (प्रतिशत) | हरियाणा, पंजाब आदि |
| वन आवरण की श्रेणियाँ (वृक्ष-छत्र घनत्व) | अति सघन वन (70% से अधिक), मध्यम सघन (40–70%), खुला वन (10–40%); 10% से कम — झाड़ी (Scrub) |
| उत्तर प्रदेश | वन आवरण राष्ट्रीय औसत से काफ़ी कम; सोनभद्र जैसे दक्षिणी ज़िलों और तराई (पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराइच) में वन अधिक |
“सबसे अधिक वन क्षेत्र — मध्य प्रदेश” और “सर्वाधिक
प्रतिशत — मिज़ोरम” पूछा जाता है; नवीनतम रिपोर्ट अवश्य देखें।
भारत के वनों के प्रकार
भारत में वनों का प्रकार मुख्यतः वर्षा की मात्रा,
तापमान और ऊँचाई पर निर्भर करता है। जहाँ
अधिक वर्षा होती है वहाँ घने सदाबहार वन, मध्यम वर्षा में
पर्णपाती वन, कम वर्षा में कँटीले वन, पहाड़ों
पर पर्वतीय वन और तटों पर मैंग्रोव वन पाए
जाते हैं।
| अधिक वर्षा → सदाबहार | ➜ | मध्यम वर्षा → पर्णपाती (मानसूनी) | ➜ | कम वर्षा → कँटीले | ➜ | ऊँचाई → पर्वतीय | ➜ | तट / डेल्टा → मैंग्रोव |
◆ 1. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (वर्षा वन)
ये वन 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले गर्म-आर्द्र क्षेत्रों में मिलते हैं
— पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल, पूर्वोत्तर
भारत और अंडमान-निकोबार। यहाँ पेड़ 60 मीटर
तक ऊँचे होते हैं और इतने घने होते हैं कि सूर्य का प्रकाश ज़मीन
तक मुश्किल से पहुँचता है।
इन्हें सदाबहार इसलिए कहते हैं क्योंकि पेड़ एक साथ
पत्तियाँ नहीं गिराते — वर्षभर हरे दिखते हैं। प्रमुख वृक्ष — आबनूस
(एबोनी), महोगनी, रोज़वुड (शीशम), रबर, सिनकोना, बाँस। इनकी लकड़ी
कठोर होती है, और वन बहुत घने होने से व्यापारिक दोहन
कठिन है।
◆ 2. उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (मानसूनी वन)
ये भारत में सबसे अधिक विस्तार वाले वन हैं।
पर्णपाती का अर्थ है — पत्ते गिराने वाले; ये पेड़
गर्मी के शुष्क मौसम में 6–8 सप्ताह के लिए पत्तियाँ गिरा देते हैं ताकि
पानी बच सके।
आर्द्र पर्णपाती वन — 100–200 सेमी वर्षा;
पूर्वोत्तर की तलहटी, हिमालय की तलहटी (तराई), झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिमी
घाट के पूर्वी ढाल। प्रमुख वृक्ष — साल, सागौन, बाँस, शीशम, चंदन, खैर, कुसुम,
अर्जुन, शहतूत।
शुष्क पर्णपाती वन — 70–100 सेमी वर्षा;
उत्तर प्रदेश, बिहार के मैदान, प्रायद्वीपीय पठार के वर्षा वाले भाग। प्रमुख वृक्ष —
सागौन, साल, पीपल, नीम।
उत्तर प्रदेश के अधिकांश प्राकृतिक वन (तराई और विंध्य-बुंदेलखंड
क्षेत्र) इसी वर्ग में आते हैं — साल तराई का प्रमुख वृक्ष है।
◆ 3. उष्णकटिबंधीय कँटीले वन एवं झाड़ियाँ
ये 70 सेमी से कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में मिलते हैं —
राजस्थान, गुजरात, पंजाब-हरियाणा के दक्षिण-पश्चिमी भाग, मध्य
प्रदेश व उत्तर प्रदेश के शुष्क भाग।
पौधों ने पानी बचाने के लिए विशेष अनुकूलन किए हैं —
पत्तियाँ छोटी या काँटों में बदली हुई, जड़ें लम्बी और
गहरी, तने मोटे और गूदेदार (पानी जमा करने के लिए)।
प्रमुख पौधे — बबूल, खेजड़ी, कीकर, बेर, नागफनी (कैक्टस), खजूर।
खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है और इसे
“मरुस्थल का कल्पवृक्ष” कहा जाता है।
◆ 4. पर्वतीय (पहाड़ी) वन
पहाड़ों पर ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है, इसलिए पेड़ों के
प्रकार भी बदलते जाते हैं — यह ठीक वैसा है जैसे भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर
वनस्पति बदलती है।
1,000–2,000 मीटर — आर्द्र शीतोष्ण चौड़ी
पत्ती वाले वन — ओक (बांज), चेस्टनट।
1,500–3,000 मीटर — शंकुधारी
(Coniferous) वन — चीड़, देवदार, स्प्रूस, फ़र, सिल्वर फ़र, ब्लू
पाइन। इनकी लकड़ी मुलायम होती है और पत्तियाँ
नुकीली (सुई जैसी), ताकि उन पर बर्फ़ न टिके।
देवदार की लकड़ी टिकाऊ होती है।
3,600 मीटर से ऊपर — अल्पाइन वन व घास के
मैदान — सिल्वर फ़र, जुनिपर, भोजपत्र (बर्च); इससे ऊपर
केवल मॉस और लाइकेन (टुंड्रा)। इन घास के मैदानों (बुग्याल) में
गुज्जर, बकरवाल, भोटिया चरवाहे पशु चराते हैं।
◆ 5. मैंग्रोव (ज्वारीय) वन
ये वन समुद्र तट और नदियों के डेल्टा में उगते हैं, जहाँ
ज्वार-भाटा के कारण खारा और मीठा पानी
मिलता है। इनकी जड़ें पानी से ऊपर निकल आती हैं (श्वसन मूल —
Pneumatophores) ताकि दलदली मिट्टी में भी साँस ले सकें।
भारत का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन सुंदरबन (गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा,
पश्चिम बंगाल) है, जिसका नाम यहाँ के सुंदरी वृक्ष पर पड़ा। यहाँ
रॉयल बंगाल टाइगर पाया जाता है। अन्य मैंग्रोव — महानदी
(भितरकनिका, ओडिशा), गोदावरी, कृष्णा डेल्टा, अंडमान-निकोबार, गुजरात
(कच्छ)।
मैंग्रोव वन सुनामी और चक्रवात से तटों की रक्षा
करते हैं, मछलियों का प्रजनन स्थल हैं और
कार्बन भी अधिक मात्रा में सोखते हैं।
| वन प्रकार | वर्षा | प्रमुख वृक्ष | क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| सदाबहार | 200 सेमी से अधिक | आबनूस, महोगनी, रोज़वुड, रबर | पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर, अंडमान |
| पर्णपाती (मानसूनी) — सर्वाधिक विस्तार | 70–200 सेमी | साल, सागौन, शीशम, चंदन, बाँस | मध्य भारत, UP, बिहार, ओडिशा |
| कँटीले | 70 सेमी से कम | बबूल, खेजड़ी, कीकर, नागफनी | राजस्थान, गुजरात |
| पर्वतीय | ऊँचाई पर निर्भर | ओक, चीड़, देवदार, फ़र, भोजपत्र | हिमालय |
| मैंग्रोव | ज्वारीय तट | सुंदरी, राइज़ोफ़ोरा | सुंदरबन, भितरकनिका |
वर्षा घटने पर सदाबहार → पर्णपाती → कँटीले; साल-सागौन
= पर्णपाती, देवदार-चीड़ = पर्वतीय, सुंदरी =
मैंग्रोव।
प्रशासनिक आधार पर वनों का वर्गीकरण
सरकार वनों के प्रबंधन और सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें तीन
श्रेणियों में बाँटती है।
आरक्षित वन (Reserved Forests) — ये सबसे अधिक
सुरक्षित वन हैं और भारत के आधे से अधिक वन क्षेत्र इसी
श्रेणी में हैं। यहाँ लकड़ी काटना, पशु चराना, शिकार आदि
पूरी तरह प्रतिबंधित है (जब तक विशेष अनुमति न हो)।
संरक्षित वन (Protected Forests) — इनमें भी कटाई पर
नियंत्रण है, पर स्थानीय लोगों को कुछ अधिकार — जैसे पशु चराना,
सूखी लकड़ी इकट्ठा करना — सीमित रूप से दिए जाते हैं। लगभग
एक-तिहाई वन इस श्रेणी में हैं।
अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests) — अन्य सभी वन जो
सरकार, समुदाय या निजी व्यक्तियों के हो सकते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों और गुजरात के कई वन
इस श्रेणी में आते हैं।
स्तर घटता जाता है। आरक्षित और संरक्षित वनों
को मिलाकर “स्थायी वन” कहा जाता है।
वनोन्मूलन : अर्थ एवं कारण
वनोन्मूलन (Deforestation) का अर्थ है — वनों को बड़े
पैमाने पर काटकर उस भूमि का उपयोग खेती, बस्ती, उद्योग, खनन या
सड़क आदि के लिए करना, जिससे वह क्षेत्र स्थायी रूप से
वन-रहित हो जाए। सरल शब्दों में, पेड़ों के कटने की दर, उनके उगने की
दर से अधिक हो जाना ही वनोन्मूलन है।
वनोन्मूलन के पीछे एक नहीं, अनेक कारण हैं — कुछ
मानवीय और कुछ प्राकृतिक। आइए इन्हें समझें।
◆ वनोन्मूलन के प्रमुख कारण
-
कृषि भूमि का विस्तार — बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक अनाज
चाहिए, इसलिए वन काटकर खेत बनाए जाते हैं। यह वनोन्मूलन का सबसे बड़ा
कारण है। -
झूम कृषि (स्थानांतरित खेती) — पूर्वोत्तर भारत की कुछ
जनजातियाँ वन के टुकड़े को काटकर और जलाकर कुछ वर्ष खेती करती हैं,
फिर नई जगह चली जाती हैं। इसे “काटो और जलाओ” (Slash and
Burn) कृषि भी कहते हैं। -
नगरीकरण और औद्योगीकरण — नए शहर, कॉलोनियाँ, कारख़ाने
बनाने के लिए वन साफ़ किए जाते हैं। -
खनन — कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट जैसे खनिज अधिकतर
वन क्षेत्रों (झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा) में मिलते हैं; खनन के लिए वन
नष्ट होते हैं। -
बड़ी विकास परियोजनाएँ — बाँध
(जलाशय में वन डूब जाते हैं), सड़कें, रेलमार्ग, बिजली
लाइनें। -
ईंधन और इमारती लकड़ी की माँग — गाँवों में खाना पकाने के
लिए लकड़ी; फ़र्नीचर व निर्माण के लिए अवैध कटाई और
तस्करी। -
अति-चराई — अधिक पशुओं के चरने से नए पौधे उग
नहीं पाते। -
वनाग्नि (जंगल की आग) — गर्मियों में प्राकृतिक या मानवीय
कारणों से; उत्तराखंड के चीड़ वन में अधिक। -
प्राकृतिक कारण — भूस्खलन, बाढ़, सूखा, कीट व रोग,
चक्रवात।
“कृ-झू-न-ख-प-ई-च-आ” = कृषि विस्तार,
झूम कृषि, नगरीकरण, खनन,
परियोजनाएँ (बाँध-सड़क), ईंधन-लकड़ी,
चराई, आग।
वनोन्मूलन के प्रभाव
जब वन कटते हैं, तो उसका असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता — मिट्टी,
पानी, हवा, मौसम, जीव-जंतु और मनुष्य सभी पर पड़ता है। इसे एक
शृंखला-प्रभाव (Chain Effect) की तरह समझा जा सकता है:
| वन कटे | ➜ | जड़ें नहीं रहीं | ➜ | मिट्टी बही | ➜ | नदियों में गाद | ➜ | बाढ़ व सूखा |
मृदा अपरदन — पेड़ों की जड़ें न रहने से वर्षा का पानी
ऊपरी उपजाऊ मिट्टी बहा ले जाता है। चंबल के
बीहड़ इसी का उदाहरण हैं।
बाढ़ और सूखा — बहकर आई मिट्टी नदियों में गाद
(Silt) बनकर जमा होती है, जिससे नदियाँ उथली होकर
बाढ़ लाती हैं; वहीं भूजल पुनर्भरण न होने से सूखा
पड़ता है।
वर्षा में कमी और जलवायु परिवर्तन — वाष्पोत्सर्जन घटने से वर्षा
कम होती है; पेड़ों के कटने और जलने से CO₂ बढ़ती है, जिससे
वैश्विक तापन बढ़ता है।
जैव विविधता की हानि — जीवों का आवास (Habitat)
नष्ट होता है और अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने लगती
हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष — जंगल घटने पर हाथी, तेंदुए,
बाघ गाँवों की ओर आने लगते हैं।
मरुस्थलीकरण — राजस्थान जैसे क्षेत्रों में मरुस्थल का
विस्तार होता है।
आदिवासियों की आजीविका पर संकट — भोजन, औषधि और आय के
साधन छिन जाते हैं; विस्थापन होता है।
भूस्खलन — पहाड़ी क्षेत्रों (उत्तराखंड, हिमाचल) में वन कटने से
भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ती हैं।
वन संरक्षण के जन आंदोलन
भारत में वनों को बचाने के लिए आम लोगों — विशेषकर महिलाओं और
ग्रामीणों — ने कई प्रेरक आंदोलन चलाए। ये आंदोलन बताते हैं कि
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार का नहीं, हम सबका दायित्व है।
◆ 1. बिश्नोई आंदोलन (1730) — खेजड़ली, राजस्थान
जोधपुर के पास खेजड़ली गाँव में राजा के सैनिक
महल बनाने के लिए खेजड़ी के पेड़ काटने आए। तब अमृता देवी
बिश्नोई पेड़ से लिपट गईं और कहा — “सिर साटे रूँख रहे, तो भी सस्तो
जाण” (सिर कटने पर भी पेड़ बच जाए तो सौदा सस्ता है)।
अमृता देवी और उनकी तीन बेटियों सहित 363 बिश्नोई लोगों ने
पेड़ों की रक्षा में प्राणों का बलिदान दिया। बिश्नोई समाज
गुरु जम्भेश्वर के 29 नियमों का पालन करता है,
जिनमें पेड़ और जीवों की रक्षा प्रमुख है।
इनकी स्मृति में “अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार”
दिया जाता है। इस आंदोलन को चिपको आंदोलन की प्रेरणा माना जाता
है।
◆ 2. चिपको आंदोलन (1973) — उत्तराखंड
चमोली ज़िले में ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई के विरोध में
ग्रामीणों ने पेड़ों से “चिपककर” उन्हें बचाया — इसी से नाम पड़ा
चिपको। शुरुआत 1973 में
मंडल गाँव से हुई।
1974 में रेणी गाँव में गौरा
देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर ठेकेदारों को लौटने पर मजबूर किया
— यह आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध घटना है।
प्रमुख नेता — सुंदरलाल बहुगुणा (नारा: “पारिस्थितिकी
ही स्थायी अर्थव्यवस्था है”) और चंडी प्रसाद भट्ट (दशोली
ग्राम स्वराज्य मंडल)। आंदोलन का प्रसिद्ध नारा — “क्या हैं जंगल के उपकार —
मिट्टी, पानी और बयार”।
इसके परिणामस्वरूप 1980 में हिमालयी क्षेत्र में हरे पेड़ों
की व्यावसायिक कटाई पर 15 वर्ष का प्रतिबंध लगा।
◆ 3. अप्पिको आंदोलन (1983) — कर्नाटक
कन्नड़ भाषा में “अप्पिको” का अर्थ है “गले
लगाना”। यह दक्षिण भारत का चिपको आंदोलन कहलाता
है।
उत्तर कन्नड़ (सिरसी) ज़िले में पांडुरंग हेगड़े के
नेतृत्व में ग्रामीणों ने पश्चिमी घाट के वनों को बचाया। इसके तीन सूत्र थे — वनों
को बचाना, नए पेड़ लगाना, वनों का समझदारी से उपयोग।
◆ 4. साइलेंट वैली आंदोलन (1970–80 का दशक) — केरल
केरल के पलक्कड़ ज़िले की साइलेंट वैली
(उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन) में कुंतीपुझा नदी पर जलविद्युत बाँध बनने
से दुर्लभ वन डूब जाते। वैज्ञानिकों, कवियों और केरल शास्त्र साहित्य
परिषद ने विरोध किया।
परिणामस्वरूप परियोजना रद्द हुई और 1984 में इसे
राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। यह वन शेर-पूँछ वाले
बंदर (Lion-tailed Macaque) का घर है।
| आंदोलन | वर्ष | स्थान | प्रमुख व्यक्ति |
|---|---|---|---|
| बिश्नोई | 1730 | खेजड़ली, जोधपुर (राजस्थान) | अमृता देवी बिश्नोई |
| चिपको | 1973 | चमोली (उत्तराखंड) | गौरा देवी, सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट |
| अप्पिको | 1983 | उत्तर कन्नड़ (कर्नाटक) | पांडुरंग हेगड़े |
| साइलेंट वैली | 1973–1984 | पलक्कड़ (केरल) | केरल शास्त्र साहित्य परिषद |
| नर्मदा बचाओ | 1985 | नर्मदा घाटी (MP-गुजरात-महाराष्ट्र) | मेधा पाटकर, बाबा आम्टे |
गौरा — चमोली; अप्पिको = “गले लगाना” — कर्नाटक;
साइलेंट वैली — केरल — 1984 राष्ट्रीय उद्यान।
वन संरक्षण के कानून, नीतियाँ एवं कार्यक्रम
स्वतंत्रता के बाद से भारत सरकार ने वनों की रक्षा के लिए कई कानून,
नीतियाँ और कार्यक्रम बनाए हैं। इन्हें क्रम से समझना परीक्षा के लिए उपयोगी
है।
भारतीय वन अधिनियम, 1927 — अंग्रेज़ों के समय का कानून, जिसने
वनों को आरक्षित, संरक्षित और ग्राम वन में बाँटा। यह आज भी लागू
है।
वन महोत्सव (1950) — तत्कालीन कृषि मंत्री के. एम.
मुंशी ने शुरू किया; हर वर्ष जुलाई के पहले सप्ताह में
वृक्षारोपण का उत्सव।
राष्ट्रीय वन नीति 1952 और फिर राष्ट्रीय वन नीति
1988 — 1988 की नीति ने पर्यावरण संतुलन को
प्राथमिकता दी और 33% वन आवरण (पहाड़ों में
66%) का लक्ष्य रखा; स्थानीय लोगों की
भागीदारी पर बल दिया।
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 — वन्य जीवों के शिकार पर
रोक; राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य की व्यवस्था।
42वाँ संविधान संशोधन (1976) — “वन” और
“वन्य जीव” को राज्य सूची से समवर्ती सूची में
लाया गया; अनुच्छेद 48A (राज्य का कर्तव्य — पर्यावरण व वनों की
रक्षा) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिक का मौलिक कर्तव्य — वनों,
झीलों, नदियों, वन्य जीवों की रक्षा) जोड़े गए।
वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 — वन भूमि को गैर-वन
कार्य (खनन, उद्योग) के लिए केंद्र सरकार की अनुमति के
बिना बदलना प्रतिबंधित। 2023 में संशोधन कर इसका नाम
“वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम” किया गया।
संयुक्त वन प्रबंधन (JFM), 1990 — ग्राम वन
समितियों के माध्यम से स्थानीय समुदाय और वन विभाग
मिलकर वनों का प्रबंधन करते हैं; बदले में समुदाय को वन उत्पादों में हिस्सा मिलता है।
वन अधिकार अधिनियम, 2006 — अनुसूचित जनजातियों और
परंपरागत वनवासियों को उनकी भूमि और वन संसाधनों पर कानूनी
अधिकार।
प्रतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम (CAMPA), 2016 — विकास
कार्यों के लिए वन भूमि लेने पर बदले में उतनी ही भूमि पर वन लगाने के
लिए कोष।
हरित भारत मिशन (Green India Mission) — NAPCC
(2008) के 8 मिशनों में से एक; वन आवरण बढ़ाना और गुणवत्ता सुधारना।
नगर वन योजना (2020) — शहरों में शहरी
वन विकसित करना।
“एक पेड़ माँ के नाम” (2024) — विश्व पर्यावरण
दिवस पर शुरू किया गया राष्ट्रीय वृक्षारोपण अभियान, जिसमें हर व्यक्ति से
अपनी माँ के सम्मान में एक पेड़ लगाने का आह्वान है।
◆ सामाजिक वानिकी एवं कृषि वानिकी
सामाजिक वानिकी (Social Forestry) — सरकारी,
सामुदायिक और बंजर भूमि पर — जैसे सड़क, नहर, रेल लाइन के किनारे,
गाँव की पंचायती भूमि — पेड़ लगाना, ताकि ग्रामीणों को ईंधन, चारा
और लकड़ी मिले और प्राकृतिक वनों पर दबाव घटे। यह शब्द
1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग ने प्रयोग
किया।
कृषि वानिकी (Agro-forestry) — खेतों में फ़सलों के
साथ-साथ पेड़ उगाना (जैसे मेड़ों पर यूकेलिप्टस, पॉपलर, नीम)। इससे किसान की
आय बढ़ती है और मिट्टी भी सुरक्षित रहती
है।
शहरी वानिकी — शहरों में पार्क, सड़क किनारे और घरों के आसपास
पेड़ लगाना।
◆ महत्वपूर्ण दिवस
विश्व वानिकी दिवस — 21 मार्च; विश्व पर्यावरण
दिवस — 5 जून; वन महोत्सव — जुलाई का पहला सप्ताह;
विश्व वन्यजीव दिवस — 3 मार्च; पृथ्वी दिवस — 22
अप्रैल; राष्ट्रीय वन शहीद दिवस — 11 सितम्बर (खेजड़ली
बलिदान की स्मृति)।
वन संरक्षण के उपाय एवं शिक्षक की भूमिका
◆ वन संरक्षण के उपाय
-
वृक्षारोपण और वनीकरण — बंजर भूमि, सड़क किनारे, विद्यालय
परिसर में अधिक से अधिक पेड़ लगाना और उनकी देखभाल
करना। -
नियंत्रित कटाई — जितने पेड़ काटें, उससे अधिक
लगाएँ; वैज्ञानिक ढंग से चयनित कटाई। -
वैकल्पिक ईंधन — LPG (उज्ज्वला योजना), बायोगैस,
सौर कुकर से लकड़ी पर निर्भरता घटाना। -
वनाग्नि की रोकथाम — अग्नि-रेखाएँ बनाना, सूखी पत्तियाँ
हटाना, जागरूकता। -
झूम कृषि के स्थान पर स्थायी खेती — सीढ़ीदार खेती,
बागवानी को बढ़ावा। -
अवैध कटाई व तस्करी पर कठोर कार्रवाई।
-
कागज़ और लकड़ी की बचत — पुनर्चक्रण
(Recycling), दोनों ओर लिखना। -
स्थानीय समुदाय की भागीदारी — संयुक्त वन प्रबंधन, पवित्र
उपवनों का सम्मान।
◆ शिक्षक की भूमिका (प्राथमिक स्तर पर)
प्राथमिक कक्षाओं में वनों के बारे में किताबी ज्ञान से अधिक अनुभव
ज़रूरी है। शिक्षक बच्चों को विद्यालय के आसपास के पेड़ों की पहचान
कराएँ — उनकी पत्तियाँ, छाल, फूल, फल इकट्ठा कराएँ और “पत्तियों की
किताब” या हर्बेरियम बनवाएँ।
बच्चों को “एक बच्चा — एक पेड़” जैसी गतिविधि से जोड़ें, ताकि हर
बच्चा अपने लगाए पौधे की देखभाल करे और उसकी वृद्धि का रिकॉर्ड
रखे। वन महोत्सव, पर्यावरण दिवस पर कार्यक्रम, प्रकृति
भ्रमण (Nature Walk), चिपको-बिश्नोई की कहानियाँ और
नाटक बच्चों में संवेदनशीलता जगाते हैं।
इको क्लब के माध्यम से कागज़ बचाना, कचरा अलग करना, पानी
बचाना जैसी आदतें विकसित करें। इस तरह बच्चे “जानने” से आगे बढ़कर
“करने” की ओर जाते हैं — यही पर्यावरण शिक्षा का
वास्तविक उद्देश्य है।
परीक्षा उपयोगी तथ्य एवं अभ्यास प्रश्न
◆ (क) एक पंक्ति में महत्वपूर्ण तथ्य
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) का मुख्यालय | देहरादून |
| भारत वन स्थिति रिपोर्ट | हर 2 वर्ष में — FSI |
| राष्ट्रीय वन नीति 1988 का लक्ष्य | 33% वन आवरण (पहाड़ों में 66%) |
| क्षेत्रफल में सर्वाधिक वन वाला राज्य | मध्य प्रदेश |
| प्रतिशत में सर्वाधिक वन वाला राज्य | मिज़ोरम |
| भारत में सर्वाधिक विस्तार वाले वन | उष्णकटिबंधीय पर्णपाती (मानसूनी) |
| सुंदरबन का नाम किस वृक्ष पर | सुंदरी |
| “मरुस्थल का कल्पवृक्ष” | खेजड़ी |
| “गरीबों की लकड़ी” | बाँस |
| बिश्नोई आंदोलन | 1730, खेजड़ली — अमृता देवी (363 बलिदान) |
| चिपको आंदोलन | 1973, चमोली — गौरा देवी, सुंदरलाल बहुगुणा |
| अप्पिको आंदोलन | 1983, कर्नाटक — पांडुरंग हेगड़े |
| साइलेंट वैली राष्ट्रीय उद्यान | 1984, केरल |
| वन महोत्सव के प्रारंभकर्ता | के. एम. मुंशी (1950) |
| वन को समवर्ती सूची में लाया | 42वाँ संशोधन (1976) |
| वन (संरक्षण) अधिनियम | 1980 (2023 में संशोधित) |
| संयुक्त वन प्रबंधन | 1990 |
| वन अधिकार अधिनियम | 2006 |
| विश्व वानिकी दिवस | 21 मार्च |
◆ (ख) भ्रम से बचें
-
वन आवरण ≠ वृक्ष आवरण — वृक्ष आवरण वन क्षेत्र के
बाहर के पेड़ हैं। -
सदाबहार वन के पेड़ भी पत्तियाँ गिराते हैं, पर एक
साथ नहीं — इसलिए वर्षभर हरे। -
आरक्षित वन सबसे अधिक सुरक्षित; संरक्षित
वन में सीमित अधिकार। -
चिपको = उत्तराखंड; अप्पिको =
कर्नाटक; बिश्नोई = राजस्थान। -
सामाजिक वानिकी = सार्वजनिक / सामुदायिक भूमि पर;
कृषि वानिकी = खेतों में।
◆ (ग) अभ्यास प्रश्न (MCQ)
प्रश्न 1. भारत में सबसे अधिक विस्तार किस प्रकार के वनों का
है?
(A) सदाबहार (B) उष्णकटिबंधीय पर्णपाती (C) कँटीले (D) मैंग्रोव
प्रश्न 2. राष्ट्रीय वन नीति 1988 के अनुसार देश के कितने भाग
पर वन होने चाहिए?
(A) 25% (B) 33% (C) 50% (D) 66%
प्रश्न 3. चिपको आंदोलन की शुरुआत किस राज्य में हुई?
(A) हिमाचल प्रदेश (B) उत्तराखंड (C) कर्नाटक (D) राजस्थान
प्रश्न 4. खेजड़ी वृक्षों की रक्षा में बलिदान देने वाली अमृता देवी
किस समुदाय से थीं?
(A) भील (B) बिश्नोई (C) गोंड (D) संथाल
प्रश्न 5. “अप्पिको” शब्द का अर्थ है —
(A) पेड़ बचाओ (B) गले लगाना (C) जंगल (D) पानी
प्रश्न 6. सुंदरबन किस प्रकार का वन है?
(A) सदाबहार (B) पर्णपाती (C) मैंग्रोव (D) पर्वतीय
प्रश्न 7. शंकुधारी (चीड़, देवदार) वन कहाँ पाए जाते हैं?
(A) राजस्थान (B) हिमालय (C) पश्चिमी घाट के निचले भाग (D) डेल्टा
प्रश्न 8. “वन” को समवर्ती सूची में किस संविधान संशोधन द्वारा
लाया गया?
(A) 42वाँ (B) 44वाँ (C) 73वाँ (D) 86वाँ
प्रश्न 9. वन महोत्सव की शुरुआत किसने की?
(A) सुंदरलाल बहुगुणा (B) के. एम. मुंशी (C) इंदिरा गांधी (D) मेधा पाटकर
प्रश्न 10. भारतीय वन सर्वेक्षण का मुख्यालय कहाँ है?
(A) नई दिल्ली (B) देहरादून (C) भोपाल (D) शिमला
प्रश्न 11. वनोन्मूलन का सबसे प्रमुख प्रभाव है —
(A) वर्षा में वृद्धि (B) मृदा अपरदन (C) भूजल वृद्धि (D) जैव विविधता में वृद्धि
प्रश्न 12. खेतों में फ़सलों के साथ पेड़ उगाना कहलाता है —
(A) सामाजिक वानिकी (B) कृषि वानिकी (C) झूम कृषि (D) वनोन्मूलन
9-B, 10-B, 11-B, 12-B
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